बुधवार, जुलाई 26, 2017

तो फिर चलो .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

तो फिर चलो
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जंग खाए पुराने तालों
बंद दरवाज़ों
और यादों के पिटारों में
क्या कोई फ़र्क़ होता है ?

नहीं तो !
रस्टिक-ताले खुलते नहीं
किसी भी चाबी से
तोड़ दिए जाएं ताले गर,
दरवाज़े कराहते हैं खुलते हुए
कमरे के भीतर बसी बासी हवाओं का झोंका
भयावह बना देता है यादों को

तो फिर चलो,
बहुत पुरानी यादों को
कहीं कर दें विसर्जित
उससे नई यादों को संजोने के लिए
..... कुछ देर मुस्कुराने के लिए।

- डॉ. शरद सिंह

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मंगलवार, जुलाई 25, 2017

लकीरों को हराते हुए .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

लकीरों को हराते हुए
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कॉपी के फटे हुए पन्ने पर
नहीं है आसान
खिलाना
प्यार का गुलाब
कुछ लकीरें लांघनी होंगी
कुछ लकीरें मिटानी होंगी
कुछ लकीरें छोड़नी होंगी
ताकि जिया जा सके
अपना जीवन
अपना प्यार
अपने ढंग से
लकीरों को हराते हुए।

इन दिनों .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

इन दिनों
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सूरज को बर्फ होते
चांद को जलते
पंछियों को तैरते
मछलियों को उड़ते
मैंने देखा है
उसे
इन दिनों बदलते

खुली किताब सा मेरा मन .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

खुली किताब सा मेरा मन
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खुली किताब सा मेरा मन
पर
क्या पढ़ने की फ़ुर्सत है
उसे
और पढ़ कर
समझने की?

किसी की याद में .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

किसी की याद में
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शाम का सूरज फिसला है
माथे से
बिंदी की तरह
और सूना हो गया मेरा मन
किसी की याद में

इनसे नहीं .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

इनसे नहीं ...
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टूटते तारे
कहते हैं मुझसे
कुछ मांगू
क्या मांगू इनसे?
मुट्ठी भर प्यार
और विश्वास
ये मुझे तुमसे चाहिए
इनसे नहीं...

सोमवार, जुलाई 10, 2017

कितना मुश्क़िल है .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


कितना मुश्क़िल है
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एक नाम होंठों से फिसला
मगर तैर न सका हवा में
एक स्वप्न आंखों में उतरा
मगर ठहर न सका दृश्यों में
मैंने जाना ठीक उसी पल
कितना मुश्क़िल है
कर पाना अभिव्यक्त प्रेम को
किसी गली, सड़क या चौराहे पर
सच, कितना मुश्क़िल है
हो पाना मुखर ...
प्रेम का ... प्रेम से ... प्रेम के लिए ...



प्यार आता है मुझे ... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh


प्यार आता है मुझे
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नींद प्यारी होती है
हमेशा नहीं
स्वप्न सुंदर होते हैं
हमेशा नहीं

फिर भी
कभी-कभी

जब मैं बना पाती हूं
रात के कैनवास पर
एक राह
फूलों वाली
सिर्फ़ तुम्हारे लिए
नींद और स्वप्न पर
प्यार आता है मुझे

- डॉ. शरद सिंह

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मंगलवार, जुलाई 04, 2017

कभी जीना इस तरह भी .... डॉ. शरद सिंह

Poetry of Dr (Miss) Sharad Singh

कभी जीना इस तरह भी
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 पसंद रहा
तुम्हें सदियों तक
हाथ भर लंबा घूंघट वाला मेरा रूप
कभी सोचा-
कैसे सांस ली मैंने
कैसे तरसी हूं ताज़ा हवा को मैं
कैसे वंचित रही सुंदर दृश्यों से
कैसे किया है दमन अपनी मानवीय इच्छाओं का
कभी रह कर देखना तुम भी
किसी अंधेरे कमरे में
जंजीरों से बंध कर
कभी जीना इस तरह भी
शायद कर सको अनुभव मेरे
अतीत की घुटन को
शायद .....